Monday, 16 January 2012

तभी वो किस्से ज़माने के, एक माँ की तरह समझाती थी..........

आँखें तो उसकी भी नाम हो जाती थी,
जब कभी बात जुदाई की आती थी,

आखिर कैसे कह दूँ में उसे बेवफा,
वो फूल सजदे में, मेरे ही नाम के चढ़ाती थी,

मजबूरियों से हारी है वो और कुछ भी नहीं,
तभी वो किस्से ज़माने के, एक माँ की तरह समझाती थी,

कैसे मान लूँ की उसे अब मेरा चेहरा पसंद नहीं,
जो मुझे कभी अँधेरे में भी पहचान जाती थी,

चाहत उसकी भी थी मुझे हमसफ़र बनाने की,
जब कभी कड़कती थी बिजली, वो मेरी बाँहों में सिमट जाती थी.......... 

Friday, 13 January 2012

पुरवईया......

चले रे चले रे, चले, चले रे चले रे, चले,
चले रे चले रे चले पुरवईया......
रैना बीते सावन भादो,
रैना बीते सावन भादो,
प्यासी है हर नदिया नदिया,

चले रे चले रे, चले, चले रे चले रे, चले,
चले रे चले रे चले पुरवईया ......
रतिया रतिया तनहा रतिया,
रतिया रतिया तनहा रतिया,
नैना खेले आँख मिचोली,
रतिया रतिया तनहा रतिया,
तेरी सुध में घुमुं दर दर,
मूंदे अपनी अँखियाँ अँखियाँ, 

चले रे चले रे, चले, चले रे चले रे, चले,
चले रे चले रे चले पुरवईया ......
आस में थारी बीती रतिया,
आस में थारी बीती रतिया,
जोगन बन बन पुकारूँ सैयां,
आस में थारी बीती रतिया,
रोक परिंदा को में छत पर,
करूँ बस थारी बतिया बतिया, 

चले रे चले रे, चले, चले रे चले रे, चले,
चले रे चले रे चले पुरवईया ......
चोखट थारी मारा मंदिर,
चोखट थारी मारा मंदिर,

देवता तू मैं हूँ पुजारिन,
चोखट थारी मारा मंदिर, 
करूँ आरती दिन और रतिया,
और निहारूं थारी सुरतिया........

चले रे चले रे, चले, चले रे चले रे, चले,
चले रे चले रे चले पुरवईया ......



Friday, 6 January 2012

"सियासतदार".........

हक की नहीं बात सियासत की करने आयें हैं,
जो लोग मेरी गली में पहली दफे आयें हैं,

सिक्कों की चाहत, और कुर्सी के अरमान उनको,
जो लोग घर से निकल कर देश बचाने आयें हैं,

अन्दर आने को तोड़ देते थे जो बंद दरवाजे,
वो लोग आज खुले दरवाजो को खटखटाने आयें हैं,

होता है कैसा दर्द गरीब का जिन्हें मालूम नहीं,
वो लोग आज उसके दर्द बाटने आयें हैं,

तस्वीरो पर चढ़नी चाहिए जिनके माला,
वो लोग खुद गले में माला पहनकर आयें हैं,

सियासत की तलब तो देखो कैसी मचल रही है,
की वो सौदा देश का एक बोतल से करने आयें हैं......  

Thursday, 5 January 2012

साजिश ए मोह्हबत........

जब से उनसे मुलाकात होने लगी है,
खूबसूरत यह शाम लगने लगी है,

इन गुस्ताख निगाहों का रवैया तो देखो,
की उनकी आँखें अब कोहिनूर लगने लगी हैं,

अल्फाजो का साहिर(जादू) कुछ ऐसा हुआ उनके,
की उनकी जुबां अब शायरी लगने लगी है,

वो जाते नहीं की फिर होने लगती है मिलने की चाह,
हर मुलाकात जैसे पहली मुलाकात लगने लगी है,

उनसे क्या मिलें की भूल गए जामने को,
यह दुनिया अब हमें बेगानी लगने लगी है,

आँखों में चमक और मुस्कराहट लबों पर,
यह साजिश हमें साजिश ए मोह्हबत लगने लगी है.....  

Tuesday, 3 January 2012

तू मेरे हक में मेरी मोह्हबत इख्तियार कर दे........

सही नहीं जाती अब यह तन्हाई हमसे,
यूँ कर के यह रात कुछ छोटी कर दे,

अगर सजदे क़ुबूल करने का वक़्त नहीं तुझे,
ए खुदा तो यह जिंदगी खत्म कर दे,

आखिर तो एक रोज छोडनी है यह दुनिया भी,
तू वक़्त से पहले ही मुझे फ़ना कर दे,

एक उम्र गुजर दी तन्हाई के सायें में मैंने,
अब इस जिंदगी की क़ैद से मुझे रिहा कर दे,

जिंदगी से डर नहीं मौत से प्यार है मुझे,
तू मेरे हक में मेरी मोह्हबत इख्तियार कर दे,

एक रोज तो दिल भी पूछ बेठेगा, आखिर यह दर्द क्यों
उसके सवाल से पहले यह धड़कन बंद कर दे,

उसका वादा था की वो नहीं देखेगा मेरा चेहरा कभी,
उसे हक है की वो मेरी मौत पर वादाखिलाफी कर दे.......
 

Sunday, 1 January 2012

सेहर होते ही सर को झुखना पड़ता है.......

रात है तो रात ही रहने दो,
अँधेरे में गरीब को सुकून मिलता है,

रात के अँधेरे में छुप जाता है मुल्क मेरा,
उजाले में हर शख्स को चिथड़ो का जवाब देना पड़ता है,

रात के वक़्त तान खड़ा रहता है सीना,
सेहर होते ही सर को झुखना पड़ता है,

मोह्हबत है अँधेरे से मेरे मुल्क को,
उजाले में तो हर एक शख्स इसे किसी का गुलाम लगता है,

छुपा लेता है अँधेरे में अपने अश्क,
उजाले में मुल्क मेरा आँखें खोलने से डरता है......    

तुझे एक पल न देखूं तो आंसूं आने लगते हैं.......

मोह्हबत के दिए जब ज़ख्म भरने लगते हैं,
उनकी यादों के सायें फिर सामने आने लगते हैं,

जब जब सोचा की नहीं देखे उन्हें,
तब तब वो अपनी जुल्फें बिखेंरने लगते हैं,

हर उस दोस्त से दुश्मनी है अब हमारी,
जो तेरी गली से गुजरने लगते है,

आखिर कैसे सोचूं तुझसे दूर जाने के लिए,
तुझे एक पल न देखूं तो आंसूं आने लगते हैं,

ज़माने से कोई चाहत नहीं अब हमारी,
ज़ख्म भरता नहीं की, फिर मोह्हबत की बात करने लगते हैं........ 

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